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शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

विकलांग तन की व्यथा मन से.........

"अरे आप तो विकलांग हैं ओहो बेचारे" शब्द सुनते ही कानो में शीशा सा पिघलता महसूस होता है लगता है की शब्द नही बाण है जो पूरे बदन को छलनी कर देता है लोगो का इस तरह बेचारगी की निगाह से देखना कितना कष्ट देता है एक विकलांग इसे अच्छे से समझ सकता है बचपन से ही विकलांग जन या तो तिरस्कार पाते है या फिर सामान्य बच्चो से अलग विशेष देख रेख में पलते है हम उम्र के बच्चे भी कभी चिढाते है तो कभी बेचारा समझ के उपहास करते है विकलांग तन कई मौते रोज मर के भी अपने को  बारबार सम्हालता है लोगो के उपहास पर हस कर अपने गीली आँखों को छिपा लेता है एक पैर से विकलांग भाई जब  किसी को चलता हुआ दौड़ता हुआ देखते है तो एक बार उनके मन से पूछिये की कितने लालयित होते है वो भी इस तरह चलने के लिए, एक मूक भाई अपनी बात बोलने के लिए कितना बेचैन होते है दिल की सारी ख्वाहिसे निकाल देने के लिए ऐसे ही बधिर भाई दुसरो की बात विचार सुनने को उत्सुक होते है मित्रो दुनिया रंगीन है और खुबसुरत भी पर वो विकलांग भाई जो  नेत्रहीन है उनसे पूछिये दिल में कितनी तड़फ होती है सब कुछ देखने की
मित्रो आज जरूरत है की हर एक विकलांग हर तरह के विकलांग का सहारा बने आपस में एक दुसरे की विकलांगता को बाट ले और अपने को किसी से कम न समझे हम विकलांग तन से है मन से नही भाई हम विकलांग है तो इसमें हमारी क्या गलती है क्यों समाज हमें उस गलती की सजा देता है जो हमने की ही नही बस बहुत हुआ भाई अब विकलांग जनों को भी सम्मान से जीने दीजिये देश जितना आपका है उतना ही हमारा भी अब विकलांग जन अपने अधिकार के प्रति सजग हो रहे अब आप हमें गुमराह नही कर सकते भाई हम समाज से वैर नही चाहते हम केवल बराबरी का हक चाहते है और वो तो हम लेकर रहेंगे सरकार को समझना पड़ेगा की वैशाखी, पेंशन और कान की मशीन बाटकर अपने कर्तव्य को पूरा कर लेने का रवैया अब छोड़ना होगा और सरकार तभी जागेगी जब हम आपस के विवाद छोड़ कर एकसाथ एक मंच पर आयेंगे तो आईये हाथ बढाइये

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