राजनीति का नाम लेते ही जिंदाबाद मुर्दाबाद के नारे वादे इरादे याद आने लगते है कोई अगड़ो का नेता कोई पिछडो का नेता कोई महिला नेत्री तो कोई अल्पसंख्यक नेता और हाँ उससे आगे भी जाट कोई गुर्जर कोई मराठा कोई तमिल नेता वाह हर समुदाय वर्ग के नेता जी है भारत देश में और उन्हें अवसर भी आरक्षण भी है की हर किसी को भागीदारी मिल सके क्या कहा आपने विकलांग जन की राजनैतिक भागीदारी अरे क्या कह दिया भाई आपने ये लोग जो स्वयं ही पीड़ितो सा जीवन जी रहे वो राजनीति करेंगे ?
क्या बात कही इन्हें तो 300 कही कही 500 ,1000 तक पेंशन(दया रूपी भीख) मिल रही सरकारी संस्थाए उपकरण बाँट रही (अरे 60% धन खा ले रही तो क्या हुआ उनको भी तो हिस्सा चाहिए) विकलांगो को नौकरी दी जा रही (आपको नही मिली तो गलती आपकी) और हां देखो तुम्हारे कितने भाई नौकरी कर रहे(चाहे रोज ही जलालत सहना पड़ रहा हो) फिर भी तुम सब चिल्लपों कर रहें हो लगता है राजनैतिक महत्वाकांक्षा जाग गयी है नेता बनने का शौक चढ़ गया है अरे चुपचाप क्यों नही पड़े रहते हमारे रहमोकरम पर
विकलांग जनों के राजनैतिक भागीदारी की बात आज जब उठ रही है तो उपरोक्त वार्तालाप आपको जरुर सुनाई देंगे मित्रो आजादी के बाद से विकलांग जनों को सुबिधा देने और समाज की भागीदारी देने के लिए सरकार ने तथाकथित कई कदम उठाए है पर जरा विचार करिए की आज धरातल पर हमें उसका कितना लाभ मिला है क्या आज विकलांग जन अपने आप में सक्षम है ?क्या सामजिक स्थिति अन्य नागरिको के बराबर हैं ? क्या विकलांग जनो को प्रत्येक क्षेत्र में उचित भागीदारी हिस्सेदारी मिली है ? क्या आज जो विकलांग जन किसी तरह नौकरी में आ गए है वो खुश हैं ? क्या आज हम एक राजनैतिक ,सामाजिक,आर्थिक रूप से मजबूत हो पाए है ?
इन सभी सवालो का जबाब आप भी खोजिये और अन्य मित्रो से भी मांगिए जल्द ही इसके आगे की बात लेकर आपके बीच फिर आऊंगा और वादा है कि आपके विचारो को भी जरुर शामिल करूँगा आपके नाम के साथ
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मंगलवार, 18 नवंबर 2014
विकलांगजनो की राजनैतिक भूमिका हिस्सेदारी व भागीदारी
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